आप सब प्रारम्भ के रचनाकार थे जिन्होंने चार आने, आठ आने व रुपिया, दो रुपिया इक्टठा किया.ये मंडी में रोज सुबह दान पेटी लेकर घुमते थे इस तरह 30-40 हजार रुपये इकट्ठा करके 7000=00 के हिसाब से 5 प्लाट खरीदे थे जो 35000=00 के पडे थे फिर इन्ही पंच-गंगा ने 10×10 का एक कमरा बनाकर उसमें भगवान गुरु गोरक्षनाथ जी की मुर्ति की स्थापना की गई इसके बाद कारवां बड़ता गया फिर दिनांक 10/8/1996 को मंदिर के पीछे दो आम वाली जगह 51000=00 में खरीदी ,फिर दिनांक 20/3/2010 को श्री संजय गुप्ता जी से 150×20 का एक पट्टा खरीदा गया, 3 लाख मे खरीदा गया था
मंदिर के संरक्षक मंडल में श्री जयराम कुलकर्णी योगी बसंत कुमार शर्मा फूलचंद जी पटेल (वामने) जगन्नाथ जी इंगले (हातोद वाले) गंगाराम जी योगी भोला पहलवान (वामने)
मंदिर की संचालन समिति : श्री सुरेश नाथ जी योगी श्री सत्यनारायण राठौर जी श्री संजय कदम जी श्री राजेश दरबार जी करण नाथ योगी (वामने) श्री सत्यनारायण योगी हैं
हिन्दू-धर्म, दर्शन, अध्यात्म और साधना के अन्तर्गत विभिन्न सम्प्रदायों और मत-मतान्तरों में नाथ सम्प्रदाय का प्रमुख स्थान है। भारतवर्ष का कोई प्रदेश, अंचल या जनपद नहीं है जिसे नाथसम्प्रदाय के सिद्धों या योगियों ने अपनी चरण रज से साधना और तत्वज्ञान की महिमा से पवित्र न किया हो। देश के कोने-कोने में स्थित नाथ सम्प्रदाय के तीर्थ-स्थल, मन्दिर, मठ, आश्रम, दलीचा, खोह, गुफा और टिल्ले इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि नाथ सम्प्रदाय भारतवर्ष का एक अत्यन्त गौरवशाली प्रभविष्णु, क्रान्तिकारी तथा महलों से कुटियों तक फैला सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने वाला लोकप्रिय प्रमुख पंथ रहा है।
नाथ सम्प्रदाय की उत्पत्ति आदिनाथ भगवान शिव द्वारा मानी जाती है। लोक कल्याण के लिए नव नारायणों ने नवनाथों, कविनारायण ने श्री मत्स्येन्द्रनाथ, करभाजननारायण ने गहनिनाथ, अन्तरिक्षनारायण ने जालन्धरनाथ, प्रबुद्धनारायण ने कानीफरनाथ, अविहोर्त्रनारायण ने नागनाथ, पिप्पलायननारायण ने चर्पटनाथ, चमसनारायण ने रेवणनाथ, हरिनारायण ने भर्तृहरिनाथ तथा द्रमिलनारायण ने गोपीचन्द्र नाथ के नाम से इसे समय-समय पर धराधाम पर फैलाया।
आदिनाथ शिव से जो तत्वज्ञान श्री मत्स्येन्द्रनाथ ने प्राप्त किया था उसे ही शिष्य बनकर शिवावतार गोरक्षनाथ ने ग्रहण किया तथा नाथपंथ और साधना के प्रतिष्ठापक परमाचार्य के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त की। महाकालयोग शास्त्र में स्वयं शिव ने यही कहा है:
अहमेवास्मि गोरक्षो मद्रूपं तन्निबोधत। योग-मार्ग प्रचाराय मयारूपमिदं धृतम् ।।
अर्थात् मैं ही गोरक्ष हूँ। उन्हें मेरा ही रूप जानो। योग मार्ग के प्रचार के लिए मैंने ही यह रूप धारण किया है। इस प्रकार श्री गोरक्षनाथ स्वयं सच्चिदानन्द शिव के साक्षात्स्वरूप हैं और जैसा कि पाश्चात्यविद्वान जार्ज ग्रियर्सन ने भी कहा है, ‘‘उन्होंने लोकजीवन का पारमार्थिक स्तर उत्तरोत्तर उन्नत और समृद्ध कर, निष्पक्ष आध्यात्मिक क्रान्ति का बीजारोपण कर योगकल्पतरु की शीतल छाया में त्रयताप से पीड़ित मानवता को सुरक्षित कर जो महनीयता प्राप्त की वह उनकी महती अलौकिक सिद्धि की परिचायिका है।’’ उन्हें चारों युगों में विद्यमान एक अयोनिज, अमरकाय सिद्ध महापुरुष माना जाता है जिसने एशिया के विशाल भूखण्ड तिब्बत, मंगोलिया, कान्धार, अफगानिस्तान, नेपाल, सिंघल तथा सम्पूर्ण भारतवर्श को अपने योग महाज्ञान से कृतार्थ किया।
नाथ सम्प्रदाय की मान्यता के अनुसार गोरखनाथ जी सतयुग में पेशावर (पंजाब) में, त्रेतायुग में गोरखपुर (उ.प्र.) में, द्वापरयुग में हरमुज (द्वारिका से भी आगे) में तथा कलियुग में गोरखमढ़ी (सौराष्ट्र) में आविर्भूत हुए थे। बंगाल में यह विश्वास किया जाता है कि गोरखनाथ जी उसी प्रदेश में पैदा हुए थे। परम्परा के अनुसार जिसका ब्रिग्स ने उल्लेख किया है जब श्रीविष्णु कमल से प्रकट हुए उस समय गोरखनाथ जी पाताल में तपस्या कर रहे थे। उन्होंने सृष्टिकार्य में श्रीविष्णु की सहायता भी की थी। जोधपुर नरेश महाराज मानसिंह द्वारा विरचित ‘श्रीनाथतीर्थावली’ के अनुसार प्रभास क्षेत्र में श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह में कंकण बन्धन श्री गोरक्षनाथ जी की कृपा से ही हुआ था।
गोरखनाथ द्वारा प्रवर्तित योगी-सम्प्रदाय सामान्यतः ‘नाथ-योगी’, ‘सिद्ध-योगी’, ‘दरसनी योगी’ या ‘कनफटा योगी’ के नाम से प्रसिद्ध है। ये सभी नाम साभिप्राय हैं। योगी का लक्ष्य नाथ अर्थात् स्वामी होना है। प्रकृति के ऊपर पूर्ण स्वामित्व स्थापित करने के लिये योगी को अनिवार्यतः नैतिक, शारीरिक बौद्धिक एवं आध्यात्मिक अनुशासन की क्रमिक विधि का पालन करना पड़ता है। प्रकृति के ऊपर स्थापित स्वामित्व चेतना एवं पदार्थ दोनों दृष्टियों से होना चाहिये, अर्थात् उसे अपने विचारों, भावनाओं, इच्छाओं और क्रियाओं, बुद्धि, मन, इन्द्रिय और शरीर तथा स्थान और समय, गरिमा और गुरुत्व, प्राकृतिक नियमों एवं भौतिक तत्त्वों आदि सभी पर नियंत्रण करना चाहिये। उसे निश्चित रूप से सिद्धि या आत्मोपलब्धि करनी चाहिये और सभी आन्तरिक सुन्दरताओं का व्यावहारिक रूप से अनुभव करना चाहिए। उसे निश्चय ही सभी प्रकार के बन्धनों, दुःखों और सीमाओं से ऊपर उठना चाहिये।.
उसे शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करनी चाहिये। उसे मृत्युंजयी होना चाहिये। उसे वास्तविक दृष्टि (दर्शन) अर्थात् परमतत्त्व की मूलभूत विशिष्टताओं को समझने के लिये अन्तर्दृष्टि की उपलब्धि होनी चाहिये। उसे अज्ञान के परदे को फाड़कर निरपेक्ष सत्य की अनुभूति करनी चाहिये और उसके साथ तादात्म्य स्थापित योगियों को विभिन्न संज्ञाएँ सम्भवतः इसलिये दी गई हैं कि जिस उच्चतम आध्यात्मिक आदर्श की अनुभूति के लिये उन्होंने योग-सम्प्रदाय में प्रवेश किया है, उसकी स्मृति अनंत रूप से बनी रहे। वे किसी भी निम्न कोटि की सिद्धि, गुह्यशक्ति या दृष्टि से ही सन्तुष्ट न हों, न उसे अपनी साधना का लक्ष्य बनावें। वे चमत्कारों की ओर प्रवृत्त न हों, क्यों कि सच्चे योगी के लिये ये सर्वथा तुच्छ हैं।
इस सम्प्रदाय के योगी कुछ निश्चित प्रतीकों का प्रयोग करते हैं, जो केवल व्यवहारगत् साम्प्रदायिक चिह्न न होकर आध्यात्मिक अर्थ भी रखते हैं। नाथ-योगी का एक प्रकट चिह्न उसके फटे हुये कान तथा उसमें पहने जाने वाले कुण्डल हैं। इस सम्प्रदाय का प्रत्येक व्यक्ति संस्कार की तीन स्थितियों से गुजरता है। तीसरी या अन्तिम स्थिति में गुरु उसके दोनों कानों के मध्यवर्ती कोमल भागों को फाड़ देता है और जब घाव भर जाता है तो उनमें दो बड़े छल्ले पहना दिये जाते हैं।
यही कारण है कि इस सम्प्रदाय के योगी को सामान्यतः कनफटा योगी कहते हैं। संस्कार का यह अन्तिम रूप योगी शिष्य की सच्चाई और निष्ठा की परीक्षा प्रतीत होता है, जो इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि शिष्य अति पवित्र जीवन व्यतीत करने तथा रहस्यमय योग-साधना में पूरा समय और शक्ति देने को प्रस्तुत है। योगी के द्वारा पहना जाने वाला छल्ला ‘मुद्रा’, ‘दरसन’, ‘कुण्डल’ आदि नामों से प्रसिद्ध है। यह गुरु के प्रति शिष्य के शरीर के पूर्ण आत्मसमर्पण का प्रतीक है। इस प्रकार का आत्मसमर्पण ही शिष्य के शरीर और मनको पूर्णतः शुद्ध कर देता है।
उसे समस्त अहमन्यताओं और पूर्वाग्रहों से मुक्त करके इतना स्वच्छ कर देता है कि वह ब्रह्म, शिव या परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभति कर सके। आध्यात्मिक ज्योति को प्रकाशित करने वाले तथा योगियों के जीवन के आदर्श स्वरूप गुरु के प्रति इस प्रकार के पूर्ण आत्मसमर्पण का तात्पर्य शिष्य के चिन्तन की स्वच्छन्दता में बाधा पहुँचाना नहीं होता वरन् इस स्वच्छन्दता की पूर्ति करना और उसे विकसित करना होता है। अवधूत (गुरु) की पूर्ण मुक्त आत्मा के साथ एकत्व स्थापित करके अहंकारमयी प्रवृत्तियों और इच्छाओं के बन्धन से उसकी आत्मा को मुक्ति प्राप्त होती है। गोरखनाथ के उन अनुयायियों को, जिन्होंने सभी सांसारिक सम्बन्धों को त्याग दिया है और योगी-सम्प्रदाय में प्रविष्ट हो गये हैं किन्तु जिन्होंने अन्तिम दीक्षा-संस्कार के रूप में कान नहीं फड़वाया है, सामान्यतः औघड़ कहते हैं। इनकी स्थिति बीच की है।
आदि योगी शिव के वंशज नाथ योगी समाज बंधु हिंगलाज माता की पूजा करते हैं साथ ही समाज में पारिवारिक जो कुलदेवी होती हैं वह हर एक की अलग होती है कई जगह माई जोत माई माता के नाम से हिंगलाज मां की पूजा होती है और नाथ संप्रदाय में 32 पद मैं से 18 पंथ बचे हैं साथ ही नाथ योगी समाज में नवनाथ 84 सिद्ध पुरुष हुए हैं और सभी की कुलदेवी हिंगलाज माता है मां है का स्थान पाकिस्तान के बलूचिस्तान के पास एक पहाड़ी पर स्थित है यहां लाखों मुसलमान आकर माता की पूजा करते हैं और उन्हें नानी की दरबार कहते है हिंगलाज माता का गुफा मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में लारी तहसील के दूरस्थ, पहाड़ी इलाके में एक संकीर्ण घाटी में स्थित है। यह कराची के उत्तर-पश्चिम में 250 किलोमीटर (160 मील), अरब सागर से 12 मील (19 किमी) अंतर्देशीय और सिंधु के मुंहाने के पश्चिम में 80 मील (130 किमी) में स्थित है। यह हिंगोल नदी के पश्चिमी तट पर, मकरान रेगिस्तान के खेरथार पहाड़ियों की एक शृंखला के अंन्त में बना हुआ है।[3][4] यह क्षेत्र हिंगोल राष्ट्रीय उद्यान के अन्तर्गत आता है।
मंदिर एक छोटी प्राकृतिक गुफा में बना हुआ है। जहाँ एक मिट्टी की वेदी बनी हुई है। देवी की कोई मानव निर्मित छवि नहीं है। बल्कि एक छोटे आकार के शिला की हिंगलाज माता के प्रतिरूप के रूप में पूजा की जाती है। शिला सिंदूर (वर्मीमिलियन), जिसे संस्कृत में हिंगुला कहते है, से पुता हुआ है, जो संभवतया इसके आज के नाम हिंगलाज का स्रोत हो सकता है।[4]
हिंगलाज के आस-पास, गणेश देव, माता काली, गुरुगोरख नाथ दूनी, ब्रह्म कुध, तिर कुण्ड, गुरुनानक खाराओ, रामझरोखा बेठक, चोरसी पर्वत पर अनिल कुंड, चंद्र गोप, खारिवर और अघोर पूजा जैसे कई अन्य पूज्य स्थल हैं।
हिंगलाज माता मन्दिर, पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त के हिंगलाज में हिंगोल नदी के तट पर स्थित नाथ योगी समाज और नाथ संप्रदाय का एक महत्वपूर्ण स्थान है एक हिन्दू मन्दिर है। यह हिन्दू देवी सती को समर्पित इक्यावन शक्तिपीठों में से एक है।[1] यहाँ इस देवी को हिंगलाज देवी या हिंगुला देवी भी कहते हैं। इस मन्दिर को नानी मन्दिर के नामों से भी जाना जाता । पिछले तीन दशकों में इस जगह ने काफी लोकप्रियता पाई है और यह पाकिस्तान के कई हिंदू समुदायों के बीच आस्था का केन्द्र बन गया है।
नाथ योगी समाज आर्यन काल से हिंगलाज मां की पूजा करते आ रहा है और भारत ही नहीं भारत के सीमावर्ती राज्य हैं देश हैं जैसे नेपाल हैं और श्रीलंका है अफगानिस्तान है म्यांमार है चीन है पाकिस्तान है सभी जगह नाथ योगी समाज की कुलदेवी मां हिंगलाज है मां के बारे में कहा जाता है कि यहां जो सच्चे दिल से मदद मांगता है वह पूरी होती है और मां हमेशा सबकी झोली भर दे तंत्र मंत्र साधना के लिए सबसे शक्तिशाली जो पेट है वह मां हिंगलाज का होता है उसके बाद मां कामाख्या मां बगलामुखी और स्कंद पुराण में इसका वर्णन है
ॐ हिंगुले परम हिंगुले,अमृत-रूपिणि। जी
तनु शक्ति मनः शिवे,श्री हिंगुलाय नमः स्वाहा ॥ महंत राजनाथ योगी बताते हैं कि यह साबर मंत्र प्रयोग और प्रभावशाली है और इस मंत्र का जाप नवरात्रि में पूरे 9 दिन 108 की संख्या में करना चाहिए तथा जब यह पहनो दिन पूर्ण होते हैं उसके बाद गरीबों को और कन्याओं को भोजन कर कर इस मंत्र को पूर्ण किया जा सकता है हिंगलाज माता का 52 शक्तिपीठों में से सबसे ज्यादा महत्व ली है कि यहां पर माता का ह्रदय गिरा था इसीलिए इसे हिंगलाज कहा गया है और सब संसार में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रद्द ही होता है इसलिए माता की महिमा और चमत्कार देखने को यहां मिलते हैं राजस्थान भारत से भी कई लोग पैदल चलकर माता के दर्शन कर दें यहां पहुंचते हैं और बड़ी तादाद में मुस्लिम लोग हिंदू की तादाद 10 परसेंट रहती हैं 90 प्रश्न जो मुस्लिम समुदाय के लोग यहां पर आकर अपनी मुराद और मन्नते पूरी करते हैं